चकिया में गाते हैं झरने



एम अफसर खान 'सागर'

मानव सभ्यता को विकसित करने में यात्राओं का अहम योगदान रहा है। यात्रा से हमें एक नई ऊर्जा मिलती है, जीवन के ठहराव को यात्रा अविरल बना देती है, तभी तो एक खुशनुमा मंजर दिखता है पूरी पृथ्वी पर घूमते मानव कबीलों का। एक शहर से दूसरे शहर तक, नदियों, पहाड़ों, रेगिस्तानों, अभेद्य जंगलों को नापते इंसान हर सू मिल जायेंगे। इंसानी यात्राओं ने पूरी पृथ्वी पर विज्ञान और विचार, व्यापार और उत्पादन, संस्कृति और मूल्यों का विस्तार किया है। तो आइए चलते हैं प्रकृति के हसीन वादियों में सकारात्म ऊर्जा एवं उल्लास, रोमांच एवं कोलाहल की तलाश में।

प्रकृति के अनमोल नजारों, इतिहास व तिलिस्म के स्वर्णिम यादों के सफर का लुत्फ उठाना तो चकिया की जानिब तशरीफ फरमाइए। यहां आपकों मिलेगा चन्द्रकान्ता की अमर प्रेम कहानी की निशानियां। राजदरी, देवदरी और विंडमफाल जैसे मनमोहक जल प्रपात। गहड़वाल राजपूत राजवंश के स्वर्णिम इतिहास भी विंध्यपर्वत श्रृंखला की इन्ही पहाड़ियों में ध्वंसावशेष के रूप में बिखरे पड़े हैं। कर्मनाशा नदी के तट पर बसे मंगरौर गांव को मरीच नगरी के नाम से भी जाना जाता है। यहां मरीच के किले का ध्वंसावशेष आज भी मौजूद है। सिकन्दरपुर स्थित कोट को सिकन्दर के किले का अवशेष माना जाता है। कोट के अन्दर अतुल सम्पत्ति की बात कही जाती है। ऐसा माना जाता है कि सिकन्दरपुर बाजार को भी सिकन्दर बादशाह ने ही बसाया था। दरअसल विंध्यपर्वत श्रृंखला की गोद में बसा उत्तर प्रदेश के जनपद चन्दौली की चकिया तहसील अपने गोद में न जाने कितने रहस्य और तिलिस्म समेटे हुए है।

कर्मनाशा नदी
बात अगर जल प्रपातों व जलाशयों की हो तो चकिया के औरवाटांड ग्राम के पास कर्मनाशा नदी पर 58 मीटर उचां सुन्दर जल प्रपात है जिसे बड़ी दरी के नाम से जाना जाता है। इसीके समीप नौगढ़ बांध का निर्माण सन् 1957-58 में हुआ है, जिसका क्षेत्रफल 19.6 वर्ग किलोमीटर में है। जिसका पानी एक-दूसरे बांधों से जुडे मूंसाखाड़ व लतीफशाह जलाशयों में जाता है। यहां का नजारा बेहद हसीन व सुहाना होता है। दूसरी नदी चन्द्रप्रभा है जिसका उद्गम स्थल पडोसी जनपद मिर्जापुर में है, यह नदी पहाड़ी मार्ग से लहराती व बलखाती हुई दो जल प्रपातों देवदरी व राजदरी के बीच से तकरीबन 400 फीट नीचे उतरती है। इन प्रपातों का दृश्य अत्यन्त आकर्षक एवं मनोहारी होने के कारण आमोद-प्रमोद की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

बलखाती लहरें
तकरीबन 9600 हेक्टेयर के विशाल भू-भाग में फैले चन्द्रभा वन्य जीव विहार में हिरन, सांभर, चीतल, खरगोश, मोर सहित अनेक वन्य जीवों के साथ दुर्लभ जड़ी-बूटियां व औषधि वृक्ष व बेशकीमती इमारती पेड़ जैसे साखु, सागौन, शीशम, विजयसार, कदम्ब, महुआ, चिरौंजी एवं तेन्दु के वृक्ष बहुतायत संख्या में मौजूद हैं। कुदरती हरियाली से सराबोर इन वादियों में निर्मल जल की लहराती-बलखाती लहरें और मनमोहती ठण्डी हवायें सैलानियों को अपनी जानिब बरबस ही खींचती हैं। जंगलों से गुजरते हुए महकते फूल डालियों से उतर कर सांसों में समा जाते हैं और जंगल अपनी विशालता के संग हमारे भीतर उतरने लगता है। पहाड़ों पर सीना ताने खड़े देवकाय वृक्ष, झरनों से बहते पानी और पक्षियों की कोलाहल में ऐसा लगता है मानो मानव जाति और पूरी कायनात का इतिहास एवं वर्तमान आपसे बातें करने को बेकरार हो।

वन क्षेत्र से आच्छादित चकिया में प्राकृतिक सुन्दरता एवं सम्पदा बिखरी पड़ी है। पहाड़ी क्षेत्र होने की वजह से यहां वनवासीयों का बसेरा है। इस क्षेत्र में कोल, वैगा, खरवार, गोंड, पनिका, धसिया, धरकार, ओरांव, और मुइया आदि प्रमुख जनजातिया निवास करती हैं। इनके प्रमुख आराध्य देव दुल्हा देव, राजा लखन, वर देव, भैसुरिया, भगवती, भैरों एवं माता शारदा प्रमुख हैं। यहां रहने वाली जनजातीय अपने पारम्परिक हथियार तीर-धनुष आदि का प्रयोग भी करते हैं। आधुनिक चकाचौंध से दूर ये लोग परम्परागत जीवनशैली और प्रचीन संस्कृति को समेटे जीवन यापन करने पर मजबूर हैं। वनवासी लोग ज्यादातर भूमिहीन और मजदूरी पेशा से जुड़े हुए हैं।

बावला की धरती
साहित्य और कला के क्षेत्र में भी चकिया का जनपद में अपनी अलग पहचान है। जनकवि व भोजपुरी के तुलसीदास की उपाधि से विख्यात रामजीयावन दास बावला का सम्बंध इसी धरती के भीषमपुर से है। बावला जी ने अपनी रचनाओं में इन वादियों का सुन्दर चित्रण किया है। उनकी रचनाओं में आमजन की व्याकुलता और उत्सुकता आसानी से मिलती है। पहाड़ और उसके रहनवासी के दर्द को बावला जी ने बहुत ही मार्मिक ढंग से पेश किया है। गजल गायक मंगला पाठक, रामजनम भारती, अशोक झा एवं रमेश पाठक का भी सम्बन्ध चकिया की धरती से है। प्रकृति ने चकिया को बेशकीमती सुन्दरता और प्राकृतिक सम्पदा से नवाजा है। चन्दौली का वनाच्छादित क्षेत्र पर्यटन की दृष्टि से बेहद मनोरम और आनन्द की अनुभूती प्रदान करने वाला है। सरकारी उदासीनता की वजह से यह क्षेत्र देश के पर्यटन के नक्शे पर नहीं उभर सका है। जरूरत है चकिया की सुरम्य वादियों को देश व विदेश के पर्यटकों की नजर में लाने की तकि इस हसीन वादियों की सोंधी मकह से लोग सराबोर हो सकें।

लेखक स्तम्भकार व पत्रकार हैं। फिलवक्त लखनऊ से प्रकाशित हिन्दी मासिक पत्रिका एडवान्टेज न्यूज में बतौर समाचार सम्पादक सेवा दे रहे हैं।