"भारतीय सिनेमा " का इनसाइक्लोपीडिया



अनामिका प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक "भारतीय सिनेमा " वस्तुतः भारत की सभी भाषाओँ के सिनेमा का इनसाइक्लोपीडिया है| हम सिनेमा की बात करते है तो अक्सर यही समझा जाता है कि बम्बई में बनने वाली हिन्दी फि़ल्में ही भारत का सिनेमा है। यह धारणा केवल उत्तर भारत और हिन्दी भाषी प्रदेशों के निवासियों की ही नहीं है, देश के बड़ी आबादियों वाले कई महानगरों के अधिकांश निवासी भी यही सोचते है। लेकिन देश की अन्य भाषाओं में बनने वाली मुख्य धारा की सैकड़ों फि़ल्मों के बारे में, खासकर तमिल, तेलुगू और मलयालम भाषाओं में बनने वाली फि़ल्मों के बारे में बहुत कम लोग जानते है। तमिलनाडु, आन्ध्रप्रदेश और केरल में ये फि़ल्में अत्यन्त लोकप्रिय है। बम्बई या बाॅलीवुड के बाहर का फि़ल्म उद्योग व्यापारिक दृष्टि से भी अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। इसलिये भारतीय सिनेमा के ऐतिहासिक वृत्तान्त और पर्यालोचन में विभिन्न भाषाओं में बनने वाली मुख्यधारा की फि़ल्मों और समान्तर सिनेमा को शामिल करना ज़रूरी है।

यहि हम सम्पूर्ण देश के फि़ल्म उद्योग पर नज़र डालें तो यह बात आसानी से समझ में आती है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा फि़ल्म निर्माता देश है। उदाहरण के लिए सन् 2009 में भारत में 2961 फि़ल्में बनी जिनमें 1288 फ़ीचर फि़ल्में थी। 2011 में देश में 1255 फ़ीचर फि़ल्मों का निर्माण हुआ जिनमें 206 हिन्दी, 192 तेलुगू, 185 तमिल, 138 कन्नड, 122 बांग्ला, 107 मराठी, 95 मलयालम, 74 भोजपुरी, 59 गुजराती और 38 उडि़या फि़ल्में शामिल हैं। 2010 में भारत का फि़ल्म उद्योग शीर्ष पर थाऋ हाॅलीवुड और चीन दूसरे और तीसरे नम्बर पर। 2011 में भारतीय फि़ल्म उद्योग की कुल आय 93 बिलियन रूपये या 1.86 बिलियन डाॅलर थी। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार 2018 में 1813 फ़ीचर फि़ल्में बनीं और 2017 में भारतीय सिनेमा की कुल बाॅक्सआॅफिस आय 158.9 बिलियन रुपये या 2.44 बिलियन डाॅलर हो गई। मुख्यधारा की भारतीय फि़ल्में विदेशों में भी लोकप्रिय हैं और फि़ल्म उद्योग की कुल आमदनी का 12 प्रतिशत वहीं से आता है। सिनेमा संगीत का योगदान भी महत्वपूर्ण है, वह कुल आय का 4 से 5 प्रतिशत है। विदेश में भारतीय फि़ल्मों का बाज़ार व्यापक है वह 90 देशों में फैला हुआ है जिनमें दक्षिण एशिया, मध्यपूर्व, दक्षिणपूर्व एशिया और सोवियत यूनियन के विघटन के बाद मध्यएशिया और पूर्वी योरोप के देश प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त करोड़ांे प्रवासी भारतीय हंै जो भारतीय फि़ल्मों को डीवीडी या सार्वजनिक प्रदर्शन के माध्यम से देखते हैं।

निस्सन्देह सिनेमा हमारे देश का प्रमुख मनोरंजन का साधन है। टेलीविज़न की व्यापकता और दर्जनांे धारावाहिकों के बावजूद सिनेमा की लोकप्रियता कम नहीं हुई है। दरअसल, एक अर्थ में धारावाहिक भी सिनेमा का एक परिवर्तित स्वरूप है जिसमें किसी एक कथानक या विषय की सम्पूर्ण गाथा को किश्तों में दिखाया जाता है।

ऐतिहासिक परिपे्रक्ष्य में देखें तो भारत मंे सिनेमा का प्रारम्भ, इस कला के उद्भव के साथ ही हुआ। लूमियेर के चलचित्र लंदन में 1895 में प्रदर्शित हुए। 1896 में लूमियेर फि़ल्में बम्बई में प्रदर्शित हुई। प्रोफेसर स्टीवेन्सन ने 1897 में कलकत्ता के स्टार थियेटर में फि़ल्म का प्रदर्शन आयोजित किया। उस प्रदर्शन के कुछ दृश्यों के आधार पर एक भारतीय फोटोग्राफर हीरालाल सेन ने 1898 में पहली मूक फि़ल्म फ़्लावर आॅफ परशिया बनाई। 1899 में बम्बई के हैंगिंग गार्डन में हरिश्चन्द्र सखाराम भाटवडेकर ने, जो सावेदादा के नाम से मशहूर थे, दो मशहूर पहलवानों - पुण्डलीकदास और ड्डष्ण नाहवी की कुश्ती पर अपनी फि़ल्म ‘दि रेसलर्स’ का प्रदर्शन किया। किसी भारतीय द्वारा बनाई जाने वाली यह पहली फि़ल्म थी। इसे हम पहला वृत्तचित्र भी कह सकते है।

18 मई 1912 वह दिन था जब भारत की पहली मूक फि़ल्म श्री पुण्डलीक कोरोनेशन सिनेमेटोग्राफ मुम्बई में रिलीज़ हुई। यह फि़ल्म दादासाहिब तोर्बे ने बनाई थी। भारत का पहला पूर्ण कथानक वाला चलचित्र था राजा हरिशचन्द्र। निर्माता, निर्देशक थे धुंदीराज गोविन्द फाल्के- दादा साहेब फाल्के। दादा साहेब फाल्के भारतीय फि़ल्म उद्योग के पुरोधा-प्रवर्तक माने जाते हैं। फि़ल्म व्यावसायिक रूप से सफल हुई और उसने उसी प्रकार की अन्य फि़ल्मों के निर्माण और प्रदर्शन का रास्ता प्रशस्त किया।

भारत में सिनेमा मनोरंजन का कितना व्यापक और सशक्त साधन है यह इस बात से ज़ाहिर होता है कि देश की सभी प्रधान भाषाओं में फि़ल्में बनती हैं, प्रदर्शित होती हंै और व्यावसायिक धरातल पर अच्छी कमाई भी करती हंै। इसलिये भारतीय सिनेमा के इतिहास में सभी भारतीय भाषाओं के सिनेमा को शामिल करना आवश्यक है। ये भाषायें हैं बांग्ला, तमिल, तेलुगू, मलयालम, कन्नड, असमिया, ओडिया, मराठी, गुजराती और पंजाबी। इनके अतिरिक्त कई आंचलिक भाषाओं में भी फि़ल्में बनती हैं और लोकप्रिय भी हैं। दर असल भोजपुरी जो उत्तरप्रदेश और बिहार की एक आंचलिक भाषा है, सिनेमा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। भोजपुरी सिनेमा के दर्शक, पूरे देश में ही नहीं, दुनिया के कई देशों में फैले हुए हैं, इसलिये भोजपुरी के साथ छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी तथा उत्तर-पूर्व भारत की आंचलिक भाषाओं-मणिपुरी, कर्बी, बोडो और खासी सिनेमा का संक्षिप्त परिचय भी इस समग्र इतिहास में सम्मिलित है। किन्तु यह भी सच है कि पुस्तक में हिन्दी सिनेमा पर अपेक्षाड्डत विस्तारपूर्वक लिखा गया है। मुख्यधारा और समान्तर सिनेमा के दो अध्यायों में उसी का विशद वर्णन और विश्लेषण है।

भारतीय सिनेमा - लेखक - महेंद्र मिश्र,
प्रकाशक- अनामिका प्रकाशन,
इलाहांबाद mob 9415347186