साहित्य, संगीत, कला की देवी



विजय केशरी

ज्ञान, कला और स्वर की अधिष्ठात्री देवी माता सरस्वती की आराधना से ज्ञान की वृद्धि होती है। माता सरस्वती ज्ञान, कला और स्वर की प्रमुख देवी है। मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति भी माता सरस्वती की आराधना और उनकी कृपा से ज्ञानी बन सकता है । माघ बसंत पंचमी को पूजित होने वाली देवी माता सरस्वती नवदुर्गा का ही एक रूप है । माता दुर्गा के ही अंश से उत्पन्न हुई देवी जगत के सभी प्राणियों में ज्ञान,स्वर और कला के रूप में अवस्थित है । माता सरस्वती भगवान ब्रह्मा की मानस पुत्री के रूप में भी जानी जाती है।

पुराण आख्यान

भागवत पुराण के अनुसार सृष्टि के निर्माण के पश्चात भगवान ब्रह्मा को महसूस हुआ कि इतनी सुंदर सृष्टि का निर्माण तो हो गया, लेकिन कहीं न कहीं कुछ कमी रह गई। जिस कारण सृष्टि का जो स्वरूप उभर कर सामने आना चाहिए, वह नहीं आ पाया। इतनी सुंदर सृष्टि निर्माण के बावजूद भी रंगहीन लग रही थी। इसलिए भगवान ब्रह्मा ने कमंडल में जल लेकर भगवान विष्णु की स्तुति की थी। भगवान विष्णु, ब्रह्मा जी की स्तुति पर तुरंत प्रकट हो गए। उन्होंने ब्रह्मा जी से स्तुति का कारण पूछा। तब ब्रह्मा जी ने बताया कि सृष्टि का निर्माण तो हो गया, लेकिन सृष्टि में वह बोध नहीं जन्म ले पा रहा है। इतनी सुंदर सृष्टि बेजान लग रही है। सृष्टि में वह सुंदर उत्पन्न नहीं हो पा रही है जिस उद्देश्य के लिए सृष्टि का निर्माण किया गया। यह सुनकर भगवान विष्णु ने भी हामी भरी । फिर दोनों देवताओं ने आदिशक्ति भगवती की आराधना प्रारंभिक की। दोनों देवताओं की आराधना से माता भगवती प्रसन्न हुई। देवी प्रकट हुई। माता भगवती आराधना का कारण पूछी। तब द्वय देवताओं ने कहा कि सृष्टि का निर्माण तो हो गया लेकिन सृष्टि के निर्माण में जो सौंदर्य बोध होना चाहिए, प्रकट नहीं हो पा रहा है। इसके लिए आप कोई उपाय करें। माता मन ही मन मुस्कुराई। तब देवी भगवती ने स्वयं से एक देवी उत्पन्न की । देवी सादा कमल पर विराजमान, श्वेत वस्त्र धारण किए, श्वेत आभूषण पहने, एक हाथ में वीणा, दूसरे हाथ में पुस्तक, तीसरा हाथ वर मुद्रा में, चौथे हाथ में माला धारण किए माता सरस्वती प्रकट हुई।

माता सरस्वती के प्रकटीकरण के साथ ही बेजान सृष्टि स्वर के रंगों से रंग गई । बहती हवाओं को स्वर मिल गया। पेड़ पौधों से सुंदर आवाजे निकलने लगी। पक्षियों के मुख से सुरीली आवाज निकलने लगी। बेजान सृष्टि को प्राणवायु मिल गई थी। यह देख भगवान ब्रह्मा और विष्णु बहुत ही प्रसन्न हुए। भगवान विष्णु और ब्रह्मा को प्रसन्न देखकर माता भगवती ने कहा, आप दोनों की मनोकामना पूर्ण हो गई । मेरे अंश से उत्पन्न देवी अब माता सरस्वती के नाम से जानी जाएगी। माता सरस्वती, ज्ञान, कला और स्वर् की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूजित होंगी। जो भी साधक व भक्त पूर्ण विधि-विधान से माता सरस्वती की आराधना करेंगे , उनकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होगी। यह काकर माता भगवती अंतर्ध्यान हो गई।

कृष्ण की बांसुरी और सरस्वती का जन्म


एक दूसरी कथा के अनुसार माता सरस्वती का जन्म भगवान कृष्ण की बांसुरी के स्वर से हुई । इस तरह की और भी कई कथाएं माता सरस्वती के संबंध में हमारे विभिन्न धर्म ग्रंथों में वर्णित है । माता सरस्वती की आराधना के संबंध में वेदों में विस्तार से वर्णन है । वेद के अलावा जैन धर्म ग्रंथ, बौद्ध धर्म ग्रंथों आदि में भी इनकी आराधना का वर्णन मिलता है । माता सरस्वती कला की देवी है। नृत्य की देवी है। ज्ञान की देवी है। इनकी आराधना शीघ्र फलदायिनी है। माघ बसंत पंचमी के दिन इनकी विशेष पूजा का विधान है। शेष अन्य दिनों में भी माता की पूजा की जाती है । माघ बसंत पंचमी के दिन माता सरस्वती की बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं स्थापित की जाती है। माता सरस्वती की पूजा बड़े ही विधि विधान के साथ की जाती है । माघ बसंत पंचमी के पवित्र दिन अक्षर ज्ञान के लिए बच्चों को कलम और खली छुआई जाती है । ऐसी मान्यता है कि इस दिन बच्चों को खली छुआने से माता सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है ।

देश में प्रचलित माता सरस्वती की पूजा खासकर स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में बड़े ही धूमधाम से की जाती है। शिक्षण संस्थानों के अलावा भी माघ बसंत पंचमी के दिन माता की बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं स्थापित कर छात्र-छात्राएं बहुत ही विधि विधान के साथ पूजा करती हैं । मंचों के माध्यम से कला की अच्छी प्रस्तुति की जाती है । नृत्य गायन, वाद विवाद के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। माघ बसंत पंचमी दूसरे दिन माता सरस्वती को विदाई दी जाती है। माता सरस्वती की प्रतिमा को बहुत ही अच्छे ढंग से सजाकर नगर भ्रमण के पश्चात किसी तालाब में विधि विधान के साथ अश्रुपूरित विदाई दी जाती है ।

ज्ञान की ज्योति
ऐसा देखा जाता है कि माता सरस्वती की आराधना से विद्यार्थियों में ज्ञान की ज्योति प्रज्वलित हो जाती है । उनका मन मस्तिष्क ज्ञान प्राप्ति की ओर अग्रसर हो जाता है। इसलिए विद्यार्थियों को बाल काल से ही माता सरस्वती की आराधना करते देखा जाता हैं। भगवती पुराण के अनुसार माता सरस्वती की आराधना से नव दुर्गा की भी कृपा प्राप्त होती है। जो साधक मां सरस्वती की आराधना करते हैं, उन पर नवदुर्गा की भी कृपा प्राप्त होती है । साथ ही भगवान ब्रह्मा, विष्णु और भगवान कृष्ण की भी कृपा प्राप्त होती है। इनके भक्तों को कभी भी पराजय का सामना नहीं करना पड़ता है । माता सरस्वती के भक्तों को विकट समस्याओं से लड़ने व विजय प्राप्त करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है । राम भक्त हनुमान जब समुद्र पार कर लंका जा रहे थे। तब माता सरस्वती की कृपा के तेज से ही वे सबों को पराजित कर लंका पहुंचने में सफल हो पाए थे। लंकाधिपति के दरबार में उन्होंने जो प्रखर ज्ञान व व्याख्यान दिया था, वह माता सरस्वती की ही कृपा थी । माता सरस्वती अपने भक्तों को कभी भी पराजित नहीं होने देती। वे अपने भक्तों के विजय पथ के मार्ग को और प्रशस्त करती है। इनके भक्त अंदर से बहुत ही शांत होते हैं । इनके मन मस्तिष्क में ज्ञान की प्रखर दीप चौबीसों घंटे प्रज्वलित होती रहती है।

माता सरस्वती ज्ञान, स्वर और कला की देवी के साथ शांति और संतोष की भी देवी है। उनके जातक माता की आराधना से शांति के साथ संतोष का भी धन प्राप्त करते हैं। उनके जातक बहुत ही संतोषी सर्वभाव के होते हैं । उनके भक्त विपरीत परिस्थितियों को अनुकूल बनाना जानते हैं । समस्याओं से कभी पीछे भागते नहीं हैं बल्कि समस्याओं के समाधान के लिए एक कदम आगे बढ़ा देते हैं। और वे सफल होते हैं। माता सरस्वती स्वर की देवी है। जो भी भक्त अपने स्वर साधना में माता सरस्वती की आराधना कर आगे बढ़ते हैं , उनकी आवाज में एक अलग कशिश पैदा हो जाती है। जिसे लोग बार-बार सुनना पसंद करते हैं। दुनिया में आज जहां कहीं भी चित्रकला मौजूद है। वह सब मां सरस्वती की ही कृपा का प्रतिफल है। दुनिया भर में तरह-तरह के मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरुद्वारा और भी विभिन्न पंथों के विशाल भवन निर्मित है । सबमें जो भी कला कृतियां है। वह सब माता सरस्वती की ही कृपा का प्रतिफल है। माता सरस्वती की आराधना से भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं। माता सरस्वती की आराधना से उनके जातक माया के बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष गामी बनते हैं। माता सरस्वती सब पर कृपा करने वाली देवी है । करुणा, ममता ,दया और धर्म की अधिष्ठात्री देवी भी है। इनके हाथ में विराजमान पुस्तक ज्ञान का प्रतीक है। वीणा कला का प्रतीक है । सफेद पूल शांति, समृद्धि और संतोष का प्रतीक है। वर मुद्रा वरदान का प्रतीक है । माता सरस्वती की आराधना से अक्षय फल की प्राप्ति होती है

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तस्वीर: अपाला वत्स

संपर्क: विजय केसरी,
(कथाकार / स्तंभकार),
पंच मंदिर चौक, हजारीबाग - 825 301,
मोबाइल नंबर - 92347 99550,