बोकारो का पुरातात्विक धरोहरों वाला गांव

Johar

डॉ. हरेंद्र सिन्हा

झारखंड राज्य में यूं तो धरोहरों की भरमार है, किन्तु सम्यक अन्वेषण के अभाव में ये थातियां जंगलों, पहाड़ों में दबी पड़ी हैं अथवा फिर ग्रामीणों के घरों में लंबे समय से अनायास उठाकर कर संग्रहित की हुई हैं। नतीजा है कि हम अपने राज्य के अनेक ऐतिहासिक साक्ष्यों से, तथ्यों से अपरिचित रह जाते हैं और ऐसा होना राज्य के सही इतिहास लेखन में बाधक है।

राज्य के पूर्व संस्कृति मंत्री अमर कुमार बाउरी की पहल से ही पूर्व में कुछ महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों का आलेखन किया जा चुका है। अब पर्यटन, कला, संस्कृति, खेलकूद एवं युवाकार्य विभाग द्वारा जिलों का विस्तृत सर्वेक्षण और आलेखन का कार्य प्रारम्भ किया गया है। बोकारो जिले के कुल नौ में प्रखंडों में से चास और चंदनकियारी प्रखंडों में हाल में ही सर्वेक्षण किए गए, जिनसे अनेकानेक अत्यंत महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहर सामने आए।

चास प्रखंड मुख्यालय से लगभग 5-6 किलोमीटर उत्तर पश्चिम दिशा में दामोदर नदी के तट पर चेचकाधाम अवस्थित है, जो इस क्षेत्र का प्रसिद्ध धार्मिक पर्यटन स्थल है। इस स्थल पर पूर्व में लगभग 10 वीं शताब्दी के एक प्राचीन मंदिर के स्थापत्य अवशेष देखे गए थे और अब यहां मंदिर परिसर में चार पांच आधुनिक मंदिर वर्ष 1997 के आसपास बना दिए गए हैं पर इस परिसर में हिंदू देवी देवताओं की अनेक प्राचीन मूर्तियां अब भी संग्रहित हैं। इनमें शैव मत से संबंधित अनेक मूर्तियां हैं। यहां सबसे आकर्षक बलुआही सैंड स्टोन का एक पैनल संरक्षित है, जिसमें तीन फ्रेम हैं। बाएं फ्रेम में दो महिला भक्तिन उत्कीर्ण हैं, बीच के फ्रेम में गणेश तथा दाएं फ्रेम में नंदी, शिव और पार्वती उत्कीर्ण हैं। इस पैनल का आकार 22 गुणा 9 गुणा 5 है।

इसी परिसर में दामोदर नदी के तट पर एक बड़े चट्टान के ऊपर, एक छोटा सा विष्णु पद मंदिर भी हाल में बना दिया गया है। इस चट्टान पर अनेक शिवलिंग-योनि भी उत्कीर्ण हैं तथा इस चट्टान के पूर्वी सतह पर दो अभिलेख भी अंकित हैं। ऊपर की ओर दो पंक्तियों का, लगभग 4 इंच की लंबाई में, उत्कीर्ण अभिलेख 8वीं -9वीं शताब्दी की प्रोटो-बंगला लिपि में है। इसे पढऩे की चेष्टा की गई तो ज्ञात हुआ कि यह संस्कृत भाषा में है। इसको भाषा विशेषज्ञों की सहायता से पढऩे की चेष्टा की जा रही है।

इसी परिसर के बाहर, समीप में ही, जंगल के बीचोबीच, एक प्रसिद्ध काली स्थान भी है, जिसे देखने से ज्ञात हुआ कि वस्तुत: यह काल भैरव की लगभग आदमकद प्रतिमा है।

चास प्रखंड के अंतर्गत, तलगडिय़ा मोड़ से लगभग 12 किलोमीटर पूरब बूढ़ा महादेव का आधुनिक मंदिर है, जिसके पीछे एक गड्ढे में 29 गुणा 23 आकार की संभवत: जैन तीर्थंकर पाश्र्वनाथ की लगभग 10वीं-12वीं शताब्दी की एक मूर्ति और इसकी बगल में 39 गुणा 15 आकार की एक अन्य मूर्ति थी, जिसके ऊपरी भाग में बैठकर दहाड़ते हुए सिंह की मूर्ति है और इसके नीचे तीर-धनुष धारण किए आक्रामक मुद्रा में एक योद्धा की आकृति उत्कीर्ण की गई है। ये दोनों मूर्तियां बूढ़ा महादेव मंदिर के पुजारी तपन कुमार दूबे के हवाले कर दी गईं।

इसी क्षेत्र में तलगडिय़ा से उत्तर प्रसिद्ध धार्मिक स्थल चेचकाधाम है। यहां से पुन: लगभग 1.5 किलोमीटर उत्तर बेलूट गांव अवस्थित है। झारखंड का ये बेलूट गांव प्राचीन मूर्तियों की खान प्रतीत होता है। इस गांव के लगभग हर घर और खलिहानों में प्राचीन मूर्तियां और सुंदर ढंग से उत्कीर्ण स्थापत्य अवशेष देखने को मिल जाते हैं। ग्रामीणों के अनुसार अभी तक कभी इन मूर्तियों आदि का महत्व जानने और बताने कोई नहीं आया। इनमें से अधिकांश मूर्तियां को वर्षों पूर्व ही संभवत: चेचकाधाम से उठाकर लोगों ने अपने अपने घरों में लगा लिया। अभी इनपर चूने की मोटी परतें चढ़ी हुई हैं, पर इन्हें पहचान पाना संभव है।

इस गांव में जैन मतावलंबियों की बहुतायत है। करीब करीब सभी घरों में एक दो मूर्तियां या स्थापत्य खंड अवश्य उपलब्ध हैं जो ज्यादातर हिंदू धर्म से संबंधित हैं तथा किसी विशाल मंदिर से संबंधित लगती हैं। एक घर में आंगन के दरवाजे के ऊपर 43 गुणा 8 आकार का पत्थर का एक पैनल देखा गया, जिसमें पांच खाने बने हुए हैं जिसमें बीच के खाने में लकुलीश(?) की बैठी हुई आकृति उत्कीर्ण की गई है, जिनके बाएं कंधे पर दाएं हाथ में पकड़ी लाठी टिकी हुई है और यहीं पर एक त्रिशूल भी उत्कीर्ण है। लकुलीश के दोनों तरफ दो-दो खानों में कुल चार उपासक भी घुटनों पर बैठे उत्कीर्ण हैं। इसी ऊंचाई पर सीढ़ी घर में भी एक पैनेल इसी की निरंतरता में दीवार में स्थिर किया गया है। इस पैनल का आकार 50 गुणा 10 है। इसमें बाईं तरफ एक जंगली सूअर उत्कीर्ण है इसके बाद दो नर्तकियां नृत्य मुद्रा में अंकित हैं। इस पैनल के किनारे को मनकों की लड़ी से सजाया गया है।

इसी घर में एक अन्य महत्वपूर्ण मूर्ति देखी गई, जिसपर 11वीं-12वीं शताब्दी की प्रोटो-बंगला लिपि में पांच पंक्तियों का एक अभिलेख भी देखा गया। यह एक स्तंभाकार, दो हिस्सों में बंटी, मूर्ति है जिसका आकार 35 गुणा 14 गुणा 9 है। ऊपर के हिस्से में 17 गुणा14.5 आकार के बैठे हुए सिंह का चित्र गोलाकार उत्कीर्ण है और इसके ठीक नीचे के आयताकार स्तंभ की बाईं सतह पर एक आक्रामक योद्धा की मूर्ति अंकित है जिसका दायां हाथ पीछे की ओर उठा हुआ है, जिसमें योद्धा ने एक तीर(?)पकड़ रखा है और बायां हाथ आगे की ओर बढ़ा हुआ धनुष धारण किए हुए है। इसका दायां पैर पीछे की ओर खिंचा हुआ है और बायां पैर आगे की ओर बढ़ती हुई मुद्रा में है। बाल में जूड़ा जैसा बना हुआ है कानों में बड़े कुंडल और कमर में धोती है। इस स्तंभ जैसी रचना का दायां और पीछे का भाग सादा है पर सामने, सिंह के पांवों के नीचे बड़े अक्षरों में पांच पंक्तियों का अभिलेख है। एक अन्य घर में एक सुंदर प्रतिमा देखी गई जो नृत्य मुद्रा में है और जिसका आकार 32 गुणा 14 है। यह किसी मंदिर के द्वार का ऊपरी हिस्सा प्रतीत होता है।

इस प्रकार पूरे बेलूट गांव में इस प्रकार की शताधिक बेहतरीन प्रतिमाएं हैं जो ऐतिहासिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं और जिन्हें ग्रामीणों ने अपने अपने घरों में संग्रहित कर रखा है। इन्हें राज्य संग्रहालय में लाने की दिशा में सरकार द्वारा कार्रवाई अपेक्षित है। इन गांवों के इतिहास को फिर से खंगालने की जरूरत है कि आखिर इस गांव में इतनी प्रतिमाओं का होना, इन्हें कुछ तो विशेष बनाता है।