एक नहीं, सैकडों रामायण हैं प्रचलित

डा. मयंक मुरारी

हरि अनंत, हरि कथा अनंता की तरह राम कथा है। रामायण केवल एक किताब नहीं है बल्कि यह एक परपंरा है। इस परंपरा में विविधता हैं। इसमे बहुलता हंैं। इसके कई स्तर है, जिसमें विभिन्न संस्कृति एवं विभिन्न समाज के लोगों की भावनाओं और विचारों का प्रकटीकरण होता है। रामायण में जनजातीय समाज की कहानी है तो आधुनिक लोगों के विचार भी है। हमारे समाज में लोक रामायण है, कार्यशील रामायण है। रामायण को हमने चित्रित किया है। हमने बनाया और लिखा है। ऐसे में जब ए0के0 रामानुजम जब कहते है कि भारत में 300 प्रकार का रामायण है, तब आश्चर्य होता है। भारत में रामायण की संख्य हजारों में है। इसके प्रकार और रूप तथा विषयवस्तु भिन्न भिन्न है। दक्षिण के विख्यात विचारक के0 सतचिदानंदन ने 2017 में एक साक्षात्कार में ये बातें अजीज थारुवना से कहीं थीं।

मानक रामायण की एक संपूर्ण परंपरा है। अकेले मलयालम में कुल 23 प्रकार की रामायण हैं। इसमें एक पताला रामायण है, जिसमें रावण को एक अन्य रावण सहायता करता है, जो पाताल लोक में रहता है। जब रावण को लगा कि अब युद्ध में मेरी हार निश्चित है तब पताला रावण ने अपनी सेना भेजी ताकि राम और रावण के युद्ध में रावण को सहयोग किया जा सके।

इसके अलावा रामायण के कई मौलिक और लौकिक संस्करण है। इसमें एक भील रामायण है। इसमें बताया गया है कि राम और रावण का कोई युद्ध नहीं हुआ, क्योंकि राम को हिंसा में विश्वास नहीं था। उनको युद्ध के प्रति अरूचि थी। अतएव रावण को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने सीता को राम के पास वापस लौटा दिया। इस प्रकार दोनों में एक समझौता संपन्न हुआ।

इसी प्रकार तेलगु समाज की महिलाओं में मौखिक रामायण का प्रचलन है, जिसमें महिलाओं को केंद्रीय भूमिका में रखा गया है। इस कारण सीता पूरे रामायण के केंद्रीय पात्र बन जाती है। वह जंगल में रहती है। जंगल में ही अपने पुत्रों को जन्म दिया। वाल्मीकि रामायण में भी सीता की भूमिका केंद्रीय है, लेकिन तेलगु रामायण में महिला को केंद्र में रखने के कारण माता सीता की भूमिका ज्यादा प्रभावशाली तरीकें से दिखाया गया है।

इसी प्रकार फादर कामिल बुल्के ने रामकथा- उत्पति और विकास एक किताब लिखी। इसी प्रकार पाॅल रीचमैन ने रामायण पर कई किताबें लिखीं,उसमें क्वेंसचनिंग रामायण: एं साउथ एशियन ट्रेडिशन (2001) नामक अंतिम किताब है। इस किताब में रीचमैन ने समकालीन कथाओं एवं कविताओं को आधार बनाकर रामायण लिखी। इसको के0 सतचिदानंदन ने अपनी किताब में भी जगह दीं। इन कथाओं एवं कहानियों को पढ़कर लगता है कि यह जीवंत परंपरा है। रामायण के संबंध में क्या महत्वपूर्ण है ? रामायण को लेकर क्या याद रखने की जरूरत है ? जब रामायण पर एक मानक किताब है, ऐसे में इन सवालों पर चिंतन नहीं किया गया, तो हम न केवल एक जीवंत संस्कृति एवं परंपरा को मरने के लिए छोड़ देंगे, बल्कि परंपरा की विविधता को भी खो देंगे। यह इसलिए भी जरूरी है कि वर्तमा में इसी परंपरा के तहत नया और नवीन रामायण का संस्करण उभर का समाज के समक्ष आ रहा है। लोग न केवल रामायण की ओर देख रहे है, बल्कि वह बता रहे है कि रामायण कई रूपों में आज भी प्रचलन में है।

मलयालम में सराह जोसेफ ने रामायण के महिला चरित्रों की कहानियों को धारावाहिक रूप में लिखा है। जैसे कि शंबुक की पत्नी। इस चरित्र को शायद ही कोई जानता हो। यह रामायण में सबसे गौण चरित्रों में शुमार है। हालांकि सराह ने सीता माता पर भी लिखा है। इसके अलावा उन्होंने मंदोदरी पर कहानी लिखी है। इस प्रकार रामायण में कई प्रकार की कहानी है, जिसमें महिलाओं के विचारों को दर्शाया गया है। इसमें हम उन सभी महिला चरित्र के विचार से सोच सकते है और उनके साथ न्याय कर सकते हैं।
इसके अलावा कई लोक रामायण है। इसमें जनजातीय समाज ने अपने देवी-देवताओं, विश्वासों, अपने पूजा पद्धतियों एवं अपने विभिन्न भौगोलिक स्थानों का उल्लेख किया है। इन सबको भगवान राम और माता सीता के साथ जोड़ने का प्रयास किया गया है, जब वे वनवास की अवधि जंगलों में बिता रहे थे। इनसे यह बताने का भी प्रयास किया गया है कि राम और सीता जनजातीय लोग थे, और उनके सारे कार्य एवं चरित्र में जनजातीय लक्षण है। एक अदयान रामायण में बताय गया है कि सीता जब पहाड़ से फल की टोकड़ी के साथ नीचे उतर रही थी, तब राम को माता सीता से प्रेम हो गया, क्योंकि माता सीता बेहद ही सुंदर थी।


इन सारी कहानियों एवं लोक भावनाआंे के माध्यम से के0 सतचिदानंदन ने यह बताने का प्रयास किया है कि रामायण की विविधता और बहुरूपता भारतीय लोकतंत्र की तरह है। भारतीय जनमानस ने सदैव से ही न केवल रामायण बल्कि महाभारत के कई प्रकार के मानक किताबों की रचना कीं। रामायण का न केवल अधिकतम मानक पुस्तक हो, बल्कि यह विभिन्न भाषाओं एवं जनजातीय एवं लोक समुदाय के माध्यम से भी हो। इन सभी समाज के पास अपना महाकाव्य है। ये सभी महाकाव्य इसलिए मौन है कि उनको मुख्यधारा में आने का अवसर ही प्राप्त नहीं हुआ। साहित्य और रचनाधर्मिता के लिए यह चुप्पी खतरनाक है। जब तक हम अपनी संस्कृति को नहीं समझेंगे, संस्कृति की समूची विविधता को नहीं जानेंगे तब तक उनके समाज द्वारा लिखे गये मानक किताबों, इन किताबों पर उनने कार्यों को नहीं जान पायेंगे। ये कहानियां एवं लोक कथाएं विभिन्न तरीकों से बार बार कहीं एवं बतायीं गयी है।

समकालीन मलयालम साहित्य में सराह जोसेफ के अलावा सी0एन0 श्रीकेंतन नायर ने रामायण को दूसरे ही तरीकें से प्रस्तुत किया है। रामायण पर आधारित उनके तीन नाटकों में लंकालक्ष्मी, साकेथम और कंचना सीता प्रमुख है। इन किताबों में एक नई व्याख्या है। कई गौण चरित्र को केंद्रीय भूमिका में रखा गया है, जैसे उर्मिला। उर्मिला के चरित्र को रामायण में प्रधानता नहीं मिली है। लेकिन मलयालम साहित्य में वह केंद्रीय भूमिका में आ जाती है, जब राम से सीता के संबंध में सवाल करती है। हम इस प्रकार से भी समकालीन साहित्यों में विश्लेषण और व्याख्या को देख सकते हैं। के0 सतचिदानंदन बताते है कि उन्होंने खुद जानकी पोरू (यानी जानकी आती है ) लिखी, जिसमें रावण को मुक्ति प्राप्त होती है। कई रामायण में यह दर्शाया गया है कि रावण एक महान योद्धा था। इसके अलावा वह भगवान शिव का भक्त था, जो स्वर्ग जाता है। इस कविता में रावण द्वारा माता सीता से कविता गाने का आग्रह किया जाता है। रावण खुद एक अच्छा गायक था। वह माता सीता को कई प्रकार का प्रलोभन देता है। वह कहता है कि तुम उस वनवासी राम को छोड़ दो, जिसने तुम्हंे जंगल में छोड़ दिया। राम ने कई निर्दोष व्यक्तियों को लंका में मारा है। व्यक्तियों के अलावा लंका के जंगल और प्रकृति को बर्बाद कर दिया गया है। अतएव तुम उसके साथ क्यों रहना चाहती हो। इन कविताओं में राम के मूलभूत नैतिकता पर सवाल उठाया गया है।

इसी प्रकार जब तमिल भाषा में कंब द्वारा लिखा रामायण को हम पढ़ते है तो उसमें भी रावण को एक नायक की तरह चित्रित किया गया है। रावण को सभी प्रकार का आदर प्राप्त होता है। कंब रामायण के अनुसार रावण वीरता में राम से कम नहीं था। इसी प्रकार जीवन के प्रति दृष्टि का मामला हो या भगवान के प्रति भक्ति हो या प्रेम की शक्ति का सवाल। दोनों बरावर के महापुरुष थे। तमिल रामायण में रावण को कई रूपों में दर्शाया गया है। कई जगह पर रावण को राम की तुलना में ज्यादा कर्मशील एवं सक्रिय बताया गया है।

अध्यात्म रामायण में वर्णन है कि रावण की वीरता से प्रभावित होकर भगवान श्रीराम ने राक्षसराज के प्रति अपनी श्रद्धा निवेदित की। वे कहते है कि रावण एक महान योद्धा के अलावा एक आदर्श मानवीय गुण का व्यक्ति था। वह एक अच्छा गायक था। उसकी एक कमी ने उसका अंत करा दिया।

रामायण की परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए लोककथाओं एवं लोक जीवन के रामकथाओं को सामने लाना होगा। यह धीरे धीरे विस्मीत होते जा रहा है। जिन व्यक्तियों को इन कथाओं का स्मरण है, वे धीरे धीरे खत्म होते जा रहे हैं। इसलिए इनका संरक्षण जरूरी है, ताकि इनपर शोध किया जा सके। इस लोकतंत्र को मजबूूत बनाने के लिए जरूरी है कि हम अपनी परंपरा की विविधता को जाने। इसके साथ ही परंपरा में सन्निहित महाकाव्यों की भूमिका को भी समझे। लोकतंत्र को बचाने के लिए भी इन बहुमूल्य धरोहर तथा विलुप्त परंपरा को बचाना एवं संरक्षित करना जरूरी है। यह इसलिए भी जरूरी है कि यह परंपरा लोक जीवन के रामायण के साथ जुड़ी है। इसको बचाकर ही हम जान पायेंगे कि लोगों का रामायण के प्रति क्या सोच था ? वे किस प्रकार से रामायण को अपने जीवन में अंगीकार किये हुए थे।