पलामू और अरण्ये दिनेरात्रि के 50 साल



प्रभात मिश्रा 'सुमन'

50 साल पूरे हो गए...जी हां, 2020 गोल्डन जुबली साल है 'अरण्येर दिनरात्रिÓ फिल्म के रिलीज होने का। पलामू के बेतला और इसके इर्द-गिर्द फिल्म की शूटिंग हुए भी 51 साल हो गए। बंगालियों का पलामू से लगाव और जुड़ाव सच कहें तो दीवानगी की हद तक है। रवींद्रनाथ टैगोर से लेकर बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के परिवार तक के रिश्ते इस जिले से रहे हैं। ऐसे में भला फिल्मकार सत्यजीत राय कैसे पीछे रहते। कैसे पीछे रहतीं अदाकारा शर्मिला टैगोर।

बंकिम बाबू के बड़े भाई संजीव चंद्र चट्टोपाध्याय पलामू में मजिस्ट्रेट के रूप में 1870 में तैनात थे। पलामू को दुनिया भर में बंगालियों के बीच लोकप्रिय बनाने में उनकी सबसे अग्रणी भूमिका रही। यहीं रहते हुए उन्होंने अपना लोकप्रिय यात्रा वृत्तांत 'पलामू' बांग्ला उच्चारण 'पालामोऊ' लिखा। इस उपन्यास में उन्होंने पलामू की अद्वितीय और मनोहारी प्राकृतिक छटा का ऐसा विवरण किया कि इसे पढऩे वाले खुद-ब-खुद यहां खींचे आने लगे। बंगालियों के मुंह से तो छुट्टियों में दो ही शब्द निकलने लगे 'पालामोऊ जाच्छी'।

यह सुखद संयोग ही था कि संजीव चंद्र चट्टोपाध्याय के आने से कोई 36 साल पहले ही रवींद्रनाथ टैगोर के दादा द्वारका नाथ टैगोर के कदम पलामू में पड़ चुके थे। उन्होंने अपने ब्रिटिश पार्टनर विलियम कार और विलियम प्रिंसेप के साथ मिलकर 1834 में डालटनगंज (अब मेदिनीनगर) से सटे राजहरा कोलियरी खरीदी थी। हालांकि डालटनगंज का नाम तब डालटनगंज नहीं था। देवेंद्रनाथ टैगौर के साथ बंगाली समुदाय के काफी लोग यहां काम करने आए और फिर यहीं के होकर रह गए।

यूं तो पूरा पलामू ही बंगालियों को काफी प्रिय था पर बेतला का नाम आते ही उनका दिल बल्लियों उछलने लगता था। यहां कि ख्याति धीरे-धीरे फिल्मकार सत्यजीत राय तक पहुंची। फिर क्या था, उन्होंने तय किया कि एक पूरी फिल्म यहीं बनेगी। साफ तौर पर तो यह पता नहीं है कि फिल्म बनाने के पहले सत्यजीत राय यहां आए थे या नहीं पर काफी लोगों का मानना है कि वे यहां आए थे और बेतला के जंगल, पहाड़ और झरनों के मुरीद हो कर लौटे थे।

जब उन्होंने फिल्म बनाने का मन बना लिया तो इस फिल्म का नाम रखा 'अरण्येर दिनरात्रिÓ यानी जंगल में रात-दिन। सुनील गंगोपाध्याय के उपन्यास का भी नाम 'अरण्येर दिनरात्रिÓ ही था। वही इस फिल्म के कहानीकार भी थे। फिल्म के निर्माता थे असिम दत्ता और नेपाल दत्ता। निर्देशक और पटकथा की जिम्मेदारी सत्यजीत राय के ऊपर थी। 20वें बॢलन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में यह फिल्म 'गोल्डन बीयरÓ के लिए नामित हुई। गौतम घोष ने इसका सीक्वल 'आबर अरण्येÓ के नाम से बनाया।

फिल्म की शुरुआत होती लातेहार के आसपास से। एक कार में सवार चार युवक पलामू की प्राकृतिक आभा को देखने आ रहे हैं। इनमें से एक युवक के हाथ में 'पालामोऊÓ उपन्यास है। इनकी कार अरुण ऑटोमोबाइल्स (पता नहीं अब ये पेट्रोल पंप है भी या नहींं) के पास पेट्रोल लेने रुकती है। यहीं एक युवक पेट्रोल भरने वाले से पूछता है 'क्या यह रास्ता पलामू जा रहा हैÓ, जवाब में 'हांÓ सुनते ही चारों के चेहरे खिल जाते हैं। यहां से चलने के बाद वे बेतला पहुंचते हैं। यहां के डाक बंगला में ठहरने का जुगाड़ बनाते हैं और ठहरने में सफल हो जाते हैं। (पहली तीन तस्वीरें पेट्रोल पंप, वहां के कर्मी के जवाब और बेतला के डाक बंगला की है।) यहां तक का रास्ता इतना घना है कि आज के लोग इस फिल्म को देखकर शायद इस पर विश्वास नहीं कर पाए।

बेतला आने के बाद चारों मित्र यहां की दुनिया में खो जाते हैं। यहीं इनकी मुलाकात दो युवतियों से होती है। इसके बाद पूरी फिल्म पलामू की हसीन वादियों और चार मित्र और इन दो युवतियों के इर्द-गिर्द घूमती है। फिल्म में सौमित्र चटर्जी ने असीम का, शुभेंदु चटर्जी ने संजय का, समित भांजा ने हरि का, रवि घोष ने शेखर का तो शर्मिला टैगोर ने अपर्णा, सिमी ग्रेवाल ने दुली और कावेरी बोस ने जया का रोल किया है।

पूरे फिल्म की शूटिंग बेतला, छीपादोहर और केचकी में हुई है। फिल्म ब्लैक एंड व्हाइट और बांग्ला में जरूर है पर यदि आपकी आंखें प्रकृति को देखने की क्षमता रखती हैं, कान वो हर भाषा समझ सकता है जो दिल तक पहुंचती है तो इस फिल्म को जरूर देखना चाहिए। सबसे बड़ी बात यह है कि सत्यजीत राय जैसा महान फिल्मकार 50 से ज्यादा साल पहले यहां की प्राकृतिक आभा को फिल्मी पर्दे पर उतार चुका है पर उसके बाद क्या हुआ....यह एक विचारणीय प्रश्न है। आज सुविधाएं ज्यादा हैं, तकनीक ज्यादा उन्नत है, कलाकारों के ठहरने के लिए बेतला, मारोमार, डालटनगंज से मॉर्डन गेस्ट हाउस से लेकर होटल तक हैं पर फिल्म एक भी नहीं बनी। वैसे स्थानीय कलाकारों को लेकर सैकत चटर्जी ने 'मारोमार, वेयर नेच बेकन्सÓ और कुछ शॉर्ट फिल्मों का निर्माण किया है पर ये बूंद के समान भी नहीं हैं। फिर दुनिया देखती पलामू के जंगलों को, झरनों को, पहाड़ों को कलकल बहती कोयल की धारा को। पापा (प्रो. सुभाष चंद्र मिश्रा) के जेहन में इस फिल्म को लेकर कई अमिट यादें हैं। वे बताते हैं, 'सत्यजीत राय 1969 में अपनी पूरी टीम के साथ छीपादोहर में रंजीत कुमार विश्वास 'मोहन विश्वासÓ जी के आवास पर ठहरे थे। यहीं उनसे मेरी मुलाकात हुई थी। तालाब में शॢमला टैगोर और सिम्मी की शूटिंग के दौरान उन्होंने कई बार कट कहा... रीटेक कराया...तब सीन फाइनल हुआ। जब मैंने कारण जानना चाहा तो सत्यजीत राय का जवाब था-इनके भाव जंगल में रहने वाली युवतियों की तरह नहीं आ रहे थे।Ó जब फिल्म रिलीज हुई तो अंग्रेजी के एक बड़े अखबार ने लिखा' The film is good but the location is fascinating and charming. एक कसक दिल में है, काश! फिर कोई सत्यजीत राय जैसा व्यक्ति यहां आता। उम्मीद है आएगा...जरूर आएगा।

लेखक अमर उजाला दिल्ली में वरिष्ठ पत्रकार हैं। पलामू हाल मोकामा।