हिंदी सिनेमा के चकाचौंध से ओझल होता इप्टा

परवेज़ कुरैशी

हिंदी सिनेमा जगत की बात हो और ऐसे चकाचौंध सिल्वर स्क्रीन में भारतीय जन नाट्य संघ इप्टा की चर्चा ना हो तो पूरी हिंदी सिनेमा का इतिहास अधूरा रह जाएगा। लगभग 107 साल के हिंदी सिनेमा की इतिहास की अगर हम चर्चा करें, तो इस दौर में जितने भी सुपर हिट फिल्में रही है , जितने भी महत्वपूर्ण रिकॉर्ड बनाए गए हैं, कालजाई फिल्में बनी है , फिल्म महोत्सव में नजर आने वाली, दर्शकों और फिल्म समीक्षकों को पसंद आई है उन सारी फिल्मों का किसी न किसी तरह से इप्टा से संबंध रहा है।


हिन्दुस्तान में फिल्म की शुरुआत भले दादा फाल्के की राजा (हरिश्चंद्र नामक) मूक प्रदर्शित फिल्म 1913 को माना जाता है। इसलिए हिंदी सिनेमा के जनक भी माने जाते हैं, और इन्हीं के नाम से आज भी बेहतर कलाकार, डायरेक्टर, संगीतकार ,गीतकार को दादा फाल्के अवार्ड से नवाजा जाता है। लेकिन हिंदी सिनेमा की सही शुरुआत 1931 में प्रदर्शित फिल्म (आलम आरा) जो बोलती फिल्म है, को मानी जाती है। जिसे निर्देशित किया था आर्देश इरानी ने ।1931 से लेकर 2020 मार्च तक हजारों फिल्मों का प्रदर्शन हो चुका है और कई कालजायी फिल्म इतिहास रच चुकी है ।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इन कालजायी फिल्मों में अगर किन्ही का अहम भूमिका रही है तो वह किसी न किसी रूप से इप्टा से जुड़े रहे है। 1931 से लेकर 90 के दशक तक में भारतीय जन नाट्य संघ इप्टा का महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इप्टा का उदय और हिंदी फिल्म का उदय एक ऐसे समय में हुआ था, या यूं कहें कि 40 के दशक एक महत्वपूर्ण समय था । एक तरफ जब दुनिया द्वितीय विश्व युद्ध से जूझ रही थी, तो वहीं हिंदुस्तान ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अपनी आंदोलन को आगे बढ़ा रहा था। स्वतंत्रता संग्राम चरम पर था और वहीं बंगाल प्रांत सूखे और अकाल के चपेट में था। ऐसी परिस्थिति में 25 मई 1943- 44 को भारतीय जन नाट्य संघ इप्टा का उदय हुआ था। इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले में होमी भाभा, ख्वाजा अहमद अब्बास, पृथ्वीराज कपूर , की महत्वपूर्ण भूमिका थी और इसके साथ आगे जुड़ते गए चेतन आनंद ,कैफी आज़मी , बलराज साहनी, पंडित रविशंकर, जोहरा सहगल ,एके हंगल जैसे शख्सियत, बुद्धिजीवियों , साहित्यकारों और कलाकारों का भी आगाज होता चला गया ।

उस दौर में फिल्म में जो बनती थी वह राजा ,महाराजा या फिर धार्मिक कहानियों पर ही आधारित होती थी । स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े या अंग्रेजो के खिलाफ कोई कहानी लिखने या फिल्म बनाने से बचते थे । लेकिन इप्टा ने इस मिथ्या को उस दौर में तोड़ा और अंग्रेजो के खिलाफ नुक्कड़ के मंच से लेकर सिलवर स्क्रीन से अंग्रेजों का विरोध किया और अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ हो रहे आंदोलन को सिल्वर स्क्रीन पर लाने का काम किया। इसकी शुरुआत बंगाल में आए अकाल पीड़ितों की मदद के लिए अन्नदाता नाटक से शुरू हुआ था। जगह-जगह मंचन कर उससे जो पैसे इकट्ठे हुए उसे अकाल पीड़ितों के लिए मदद की गई। फिर कृष्ण चंद के लिखे इसी अन्नदाता नाटक को अन्नदाता पर आधारित 1946 में पहली रियलिस्टिक फिल्म (धरती के लाल) बनाई गई थी। यह भारत की पहली ऐसी फिल्म है जिसे कान फिल्म फेस्टिवल में दिखाई गई थी। इस फिल्म के निर्देशक थे इप्टा के संस्थापक ख्वाजा अहमद अब्बास, और निर्माण किया था इप्टा ने । फिल्म के नायक थे बलराज साहनी, जोहरा सहगल, संगीत दिए थे पंडित रविशंकर की पूरी तरह से फिल्म इप्टा और इसके कलाकारों से जुड़ी फिल्म थी। इसके बाद सिनेमा का असल दौर 50 के दशक माना जाता है । कई मायने में महत्वपूर्ण काल भी रहा है।

इस दौर में त्रिमूर्ति यानी दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनंद जैसे दिग्गज अभिनेता का उदय माना जाता है। 1951 में राज कपूर और नए विचार के साथ दर्शकों तक अपनी फिल्म आवारा लेकर पहुंचे, यह फिल्म कई मायने में कामयाब मानी जाती है । आवारा फिल्म की पटकथा लिखने वाले इप्टा के संथापक ख्वाजा अहमद अब्बास है। पिताजी पृथ्वीराज कपूर इप्टा के सक्रिय पदाधिकारी थे इसलिए उनके आंगन में रोज नाट्य रिहर्सल होता था जिसे देखते हुए राज कपूर बड़ा हो रहे थे।

1952 में विमल राय ने औद्योगिकीकरण की नीतियों पर सवाल उठाते हुए किसानों के विस्थापन के दर्द के साथ सबसे चर्चित और सुपरहिट फिल्म बनाई थी( दो बीघा जमीन) इस कालजयी फिल्म में जान डालने वाले नायक बलराज साहनी थे जिनका संबंध इप्टा से रहा है। 1958 में कर्णप्रिय संगीत से सजी फिल्म मधुमति जिसके नायक दिलीप कुमार और नायिका वैजयंती माला थी। इस कामयाब फिल्म का मधुर गीत लिखने का श्रेय शैलेंद्र को जाता है और संगीत देने के लिए सलिल चौधरी को आज भी याद किया जाता है। सलिल चौधरी और शैलेंद्र दोनों का संबंध इप्टा से रहा है।

इसी दशक में 1958 में एक ऐतिहासिक फिल्म आई थी जिसके निर्देशक महबूब खान और फिल्म का नाम था मदर इंडिया । महेबूब खान की कल्पनाशीलता और सुनील दत्त के अभिनय से सजी फिल्म आज भी याद किया जाता है। इस फिल्म के अभिनय के लिए नरगिस को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। सुनील दत्त का जुड़ाव इप्टा से था। देवानंद उस जमाने में किसी से कम नहीं थे और इनके बड़े भाई चेतन आनंद इप्टा के सक्रिय सदस्यों में थे , इसलिए देवानंद का भी इप्टा से लगाव रहा है । बनारसी बाबू, गाइड जैसी ऐतिहासिक फिल्म के लिए उन्हें आज भी याद किया जाता है।

1960 में आयी के. आसिफ की ऐतिहासिक और मल्टीस्टारर फिल्म मुग़ल-ए-आज़म जिसे दुनिया आज भी भव्य सेट और अभिनय के लिए याद करते है । इस फिल्म में पृथ्वीराज कपूर के बेहतरीन संवाद अदायगी और दिलीप कुमार का अभिनय को कोई भुला नहीं सकता । पृथ्वीराज कपूर ने इस फिल्म में जान डाल दिए थे और अकबर बादशाह को 60 के दशक में फिर से जिंदा कर दिया था। पृथ्वीराज 1943 से 1945 तक इप्टा से जुड़े थे। इसके बाद उन्होंने पृथ्वी थिएटर की स्थापना की थी। साठ के दशक में भारत और चीन युद्ध पर बनी फिल्म चेतन आनंद की फिल्म हकीकत आज भी दर्शकों के जेहन में रचा और बसा है । चेतन आनंद का भी संबंध इप्टा से रहा है।

हकीकत फिल्म के गीतकार रहे कैफी आजमी को भला कौन भुला सकता है। जरा सी आहट होती है.... कर चले हम फिदा जानो तन साथियों ..... के लिखने वाले रहनुमा को आज भी याद किया जाता हैं । 70 के दशक तक हिंदी सिनेमा पूरी तरह से कमर्शियल हो चुकी थी, काफी आगे निकल चुकी थी ,अश्लीलता के सहारा लेने लगी थी , उसी के सहारे आगे बढ़ रही थी, तो ऐसे समय में (शोले) को की सफलता ने इतिहास रच दिया । जानकर आश्चर्य होगा कि शोले में जान डालने वाले संजीव कुमार के ठाकुर का किरदार आज भी यादगार है। ए. के हंगल इमाम साहब की भूमिका में थे दोनों का इप्टा से रहे है । संजीव कुमार और ए के हंगल अपने अंतिम समय तक इप्टा से ही जुड़े रहें । जब फिल्में करोड़ों रुपए में बनने लगी और तकनीक और अश्लीलता के दौर से जब गुजरने लगी तो, ऐसे समय में एम एस मैथ्यू की फिल्म( गरम हवा) मील का पत्थर साबित हुआ। कमर्शियल के दौर में कला फिल्मों ने अपना एक अलग छाप छोड़ा और इसमें भी इप्टा की महत्वपूर्ण भूमिका रही । गरम हवा फिल्म में बलराज साहनी ने यादगार भूमिका निभाई, वही दिल को छू लेने वाला गाना भूपेन हजारिका का गाया गाना उसे आज भी लोग गुनगुनाने पर मजबूर है । इसी दौर में अंकुर ,मंडी, अर्थ, पार जैसी कलात्मक फिल्मों में जान डालने वाली नायिका शबाना आजमी जिनकी अभिनय पर जितनी भी बात करें तो कम होगा । कैफ़ी आज़मी की बेटी है और अपने पिता के इप्टा को कभी कमजोर होने नहीं दी ।

80 के दशक आते-आते नूरी,गोलमाल, चीत चोर,उमराव जान जैसी बेहतरीन फिल्मों से अमोल पालेकर व फारुख से का जन्म हुआ। इस दौर में कॉमेडी फिल्म (शौकीन )जिसमें अशोक कुमार, ए. के हंगल , उत्पल दत्त नजर आए 50 के उम्र पार कर चुके इन बुजुर्ग कलाकारों ने जो कॉमेडी का इतिहास रचा है जो मिटाएं नहीं मिट सकती। लेकिन नब्बे के दशक आते-आते फिल्म महंगी होती चली गई और इप्टा का रंग फीका होते चला गया। जिस सिल्वर स्क्रीन को इप्टा ने चमकाना शुरू किया था वह धीरे-धीरे ओझल होने लगा।

सलमान खान ,शाहरुख खान, अजय देवगन जैसे कलाकारों के जमाने में फिल्मों में अंजन श्रीवास्तव करेक्टर रोल में नजर आ कर इप्टा पहचान को सहारा देने का काम किया। लेकिन 2000 के दशक में यह काफी ओझल हो गया गिने-चुने फिल्मों में जेपी दत्ता की फिल्म बॉर्डर में सुदेश बेरी नजर आए लेकिन वह बड़े स्टार पुत्रों के भीड़ में कहीं खोते चले गए। 2000 से लेकर 2020 तक कुछ सुपरहिट फिल्में आई , 2013 की चर्चित फिल्म विश्वरूपम जिसके लेखक अतुल तिवारी है , इन्होंने 3इडियट फिल्म में नेता की भूमिका में भी नजर आ चुके हैं।

समय गुजरता गया और इप्टा का प्रभाव सिल्वर स्क्रीन से कम होता चला गया । देखते देखते हिंदी सिनेमा में वह चमक,दमदार आवाजें, बेहतरीन संवाद अदायगी, खूबसूरत गीत और मखमली आवाज जिससे हिंदुस्तान के श्रोता और दर्शक वंचित होते चले गए।इप्टा न सिर्फ सिल्वर स्क्रीन से बल्कि रंगमंच से भी धीरे-धीरे ओझल होते चला जा रहा है।

पेशे से पत्रकार। मन से रंगकर्मी, पेंटिंग में रुचि। रांची में रहते हैं

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