भारत की महागाथा : एकदा भारतवर्षे



Chauraha. in

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा की अभी-अभी एक किताब आई है-'एकदा भारतवर्षे'। इसके पूर्व आपने अमृतलाल नागर की पौराणिक उपन्यास एकदा नैमिषारण्ये आपने पढ़ी होगी। यहां समानता पर शीर्षक को लेकर है...। नागर नैमिषारण्य की कथा कहते हैं। उनके एक कालखंड विशेष है। इसमें काल का प्रवाह है। इस प्रवाह में भारत की चार-पांच हजार साल की कहानी है। किस्सा है। इन किस्सों से हम अपने भारत के बारे में जानने की कोशिश करते हैं। पुरा काल, वैदिक काल, पौराणिक काल...तुलसी-कबीर से होते हुए वर्तमान काल तक...। एक लंबी और सुदीर्घ यात्रा से गुजरते हुए हमें अपने अतीत का भान होता है। उस अतीत का, जब दुनिया में सभ्यता नाम की चीज नहीं थी, तब भारत के वैदिक ऋषि छंदों में प्रकृति का गान कर रहे थे। आप इसके पहले हेमंत जी की दो पुस्तकों 'युद्ध में अयोध्या' और 'अयोध्या का चश्मदीद' भी देखें होंगे। आपको उनकी मानसरोवर यात्रा पर द्वितीयोनास्ति और 'तमाशा मेरे आगे' और 'साधो ये उत्सव का गांव' में आप बनारस की परिक्रमा कर सकते हैं। इस लेखन में उनकी पूरी मित्र मंडली शामिल है। बनारस के समझने-बूझने की एक जरूरी किताब है।

वैसे, उनके रचनात्मक लेखन से उस समय परिचय हुआ, जब उन्होंने भारतेंदु समग्र का संपादन किया था। हिंदी प्रचारक संस्थान, बनारस ने मात्र पचास रुपये में इसे प्रकाशित किया था। 1993 के आस-पास संस्थान कई समग्र बहुत सस्ते दामों में प्रकाशित किए थे। इसके पूर्व उनकी अयोध्या पर लाइव रिपोर्टिंग एक लघु पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। यह हम सबके लिए भी यह सीख थी कि लाइव रिपोर्टिंग कैसे करनी चाहिए? अब आप 'युद्ध में अयोध्याÓ और 'अयोध्या का चश्मदीदÓ में पढ़ सकते हैं।
'एकदा भारतवर्षे' मनु की यात्रा से प्रारंभ होती है। कह सकते हैं, सृष्टि की कथा से। लेकिन यह सृष्टि के रचाव की नहीं, बचाव की कथा है। मनु एक मछली की मदद करते हैं और यह मछली एक समय उनकी मदद करती है। मत्स्य अवतार की यह प्रेरक कथा यही बताती है, हमें दूसरों की मदद करनी चाहिए।
बुद्ध ने क्या कहा था? अप्प दीपो भव-मैंने जो कुछ कहा है, उसे भूल जाओ। तुम्हारे पूर्वजों ने जो भी कहा है, उसे भी भूल जाओ और अपने अंत:करण पर विश्वास करो। अपने विवेक पर विश्वास करो। दूसरे के प्रकाश के भरोसे से कहीं अच्छा है कि स्वयं दीप हो जाओ। अप्प दीपो भव। अपना पथ स्वयं आलोकित करो। ढाई हजार साल पुरानी इस कथा में क्या नवीनता नहीं है? आनंद को जो बुद्ध ने समझाया-बताया था-क्या वह आज भी प्रासंगिक नहीं है। हमें दूसरों के नहीं, अपने अनुभव पर भरोसा करना चाहिए। कृष्ण ने भी अर्जुन की उलझन दूर की थी और बुद्ध ने भी आनंद की। इन उलझावों को दूर करने के लिए ही यह कथा बुनी जाती है। कथा के माध्यम से हम चीजों को बहुत आसानी से समझ लेते हैं। इसलिए, कथा की यह परंपरा बहुत पुरानी है।

हेमंत भी कृष्ण को समझने की कोशिश करते हैं। कृष्ण आखिर है क्या? वह बताते हैं, कृष्ण के जीवन से एक बात सीखने को मिलती है। कोई कितना ही ज्ञानी हो, महापुरुष हो, ब्रह्मनिष्ठ हो, चमत्कारी हो, पर उसका आचरण ऐसा होना चाहिए, जैसो साधारण मनुष्य का। कृष्ण ने यह करके दिखाया। कृष्ण पूर्ण ज्ञानी हैं, फिर भी ज्ञान पर अपना मुंह तक नहीं खोलते, जब तक अर्जुन हाथ जोड़कर प्रार्थना नहीं करता। शिष्यते अहं शाधि मां त्वं प्रपन्नम्। कृष्ण का चरित्र ऐसा ही है। हमारे पास थोड़ा भी ज्ञान हो जाए, तो उसका हम प्रदर्शन करते चलते हैं। एक कहावत भी है-अधजल गगरी छलकत जाए। उन्हें पूर्णावतार कहा गया है। कई बार सोचता हूं, उन्हें पूर्णावतार क्यों कहा गया? कृष्ण का चरित्र ही ऐसा है। उनके भीतर सब कुछ समाहित है। साहित्य, संगीत और कला...। वे बांसुरी बजाते हैं और चक्र भी चलाते हैं। जरूरत पड़ती है तो महारास भी रचाते हैं। युद्ध भी करते हैं-छल प्रपंच के साथ। जो जैसा है, उसके साथ वैसा ही व्यवहार...वे राम की तरह मर्यादा का ख्याल नहीं रखते। युद्ध भूमि में भी वे संशयात्मा के संशय को दूर करते हैं।

ऐसा नहीं, कि इस पुस्तक में राम अनुपस्थित हैं। राम की व्याप्ति भी चराचर में है। सबके अपने-अपने राम हैं। कबीर के अपने राम हैं, तुलसी के अपने। वाल्मीकि के अपने। गांधी के अपने। विद्यानिवास मिश्र और कुबेरनाथ राय के अपने। एक ही चरित्र को लोगों ने अलग-अलग ढंग से देखा-परखा और अपना पाया। लोग उसमें रम गए। वे राम के हो गए। अभी आशुतोष राणा की पुस्तक रामराज्य आई है-वहां भी राम की एक अद्भुत और लौकिक व्याख्या मिलती है। बाकी तो आप नरेंद्र कोहली को पढ़ें ही होंगे। इसलिए, हेमंत के भी राम हैं-'राम का आदर्श, लक्ष्मण रेखा की मर्यादा है। लांघी तो अनर्थ। सीमा में रहे तो खुशहाल और सुरक्षित जीवन। वे जाति वर्ग से परे हैं। नर, वानर, आदिवासी, पशु, मानव-दानव सभी से उनका करीबी रिश्ता है। अगड़े-पिछड़े से ऊपर उठकर प्राणिमात्र से उनका नाता है। निषादराज हों या सुग्रीव, शबरी हों या जटायु, सभी को साथ लेकर चलने वाले वे अकेले देवता हैं।Ó यह राम के चरित्र की उद्दात्तता है कि वे अपना पुरोहित रावण को चुनते हैं। यह जानते हुए कि उसका वध करना है और यह बात रावण भी जानता है। कथा प्रचलित है। आप जानते ही हैं, लेकिन आप जानते हैं, रावण ने दक्षिणा में क्या मांगा? रावण ने कहा-'आचार्य होने के नाते मैं आपसे दक्षिणा मांगता हूं कि जब मेरा अंतिम समय आए तो यजमान मेरे समक्ष उपस्थित रहें। मैं आपसे बस यही दक्षिणा मांगता हूं।Ó

अभी धनतेरस और दीपावली की तैयारी चल रही है। धनतेरस दीपावली की दस्तक है। लक्ष्मी पूजा से लेकर नए बर्तन खरीदने का कर्मकांड और वैद्यों के लिए धन्वंतरि की जयंती। धन्वंतरि का प्रादुर्भाव समुद्र मंथन से निकले कलश से अंड के रूप में हुआ था। इसकी पूरी कथा और उसके स्नायुतंत्र की यहां व्याख्या है। वैसे ही दीपावली का भी। अंधकार से प्रकाश की यात्रा। वह कहते हैं, दीपावली जीवन के गहन अंधकार के बीच रोशनी का उत्सव है। वर्ष की सबसे अंधेरी रात में दीपावली आती है। दीपावली का एक नन्हा दीया अंधकार के समूचे सागर को चुनौती देता है। इसी दीये की, प्रकाश की बात तो बुद्ध भी करते हैं। दीये में ही यह अजस्र शक्ति है कि वह गहन अंधकार को भी निगल ले। 114 कहानियां से गुजरते हुए हमें अपने देश की सीमा का भान नहीं होता। कुछ कहानियां, दूसरे देशों की हैं, जो हमारे भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं। इस संचरण में भाषा हमारा साथ नहीं छोड़ती। कहन की एक अलग शैली यहां मौजूद है, जो हमें लुभाती है। यह संस्कार हो सकता है, उनके पिता मनु शर्मा से मिला हो, इसमें उनका अपना भी बहुत कुछ है। बनारसीपन तो है ही। भाषा को बरतने की कला वे तुलसी और कबीर दोनों से ग्रहण करते हैं। इसलिए, सांच भी कहते हैं, लेकिन उसमें शहद भी है।

पुस्तक: एकदा भारतवर्षे
प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली
कीमत सात सौ रुपये


लेखक के बारे में

जन्म और संस्कार पाया काशी में। समाज, प्रकृति, उत्सव, संस्कृति का ज्ञान यहीं हुआ। शब्द, तात्पर्य और धारणाओं की समझ भी वहीं बनी।नौकरी के लिए लखनऊ में रहे। वहीं राजनीति के बहुलवादी चरित्र, समाज परिवर्तन, सांप्रदायिकता, दलित-उभार, चुनाव संबंधी अध्ययन हुआ। पंद्रह साल तक जनसत्ता के राज्य संवाददाता रहने के बाद दो साल हिंदुस्तान, लखनऊ में संपादकी की। फिर लंबे अर्से तक टीवी पत्रकारिता । अब दिल्लीवास। लेकिन बनारस भी छूटा नहीं। अयोध्या आंदोलन को काफी करीब से देखा। ताला खुलने से लेकर ध्वंस तक की हर घटना की रिपोर्टिंग के लिए अयोध्या में मौजूद इकलौते पत्रकार। |व्यवस्थित पढ़ाई के नाम पर बी.एच.यू. से हिंदी में डॉक्टरेट। लिखाई में समकालीन अखबारी दुनिया में कलम घिसी। कितना लिखा? गिनना मुश्किल है। गिनने की रुचि भी कभी नहीं रही। भारतेंदु समग्र का संपादन जरूर याद है। कैलास-मानसरोवर की अंतर्यात्रा कराती पुस्तक द्वितीयोनास्ति' बहुचर्चित । व्यक्ति, समाज, समय, उत्सव, मौसम पर केंद्रित किताब 'तमाशा मेरे आगे' बहुपठित। राजनीति, समाज, परंपरा को समझने और पढ़ने का क्रम अब भी अनवरत जारी।पहले लेखन को गुजर-बसर का सहारा माना, अब जीवन जीने का। संपर्क : जी-180, सेक्टर-44, नोएडा।

इ-मेल : hemantmanusharma@gmail.com

 

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