भाषणों के आईने में लालू प्रसाद यादव



सुरेश कुमार

इसमें कोई दो राय नहीं है कि सवर्ण पंडितों और ज्ञानियों ने दलित और पिछड़े समाज के बुद्धिजीवियों और राजनेताओं का मूल्‍यांकन दरियादिली से नहीं, बल्कि संकुचित दायरे में किया है। इन ज्ञानियों के भ्रम और किंवदंतीपरक मूल्यांकन ने बहुजन समाज के नेताओं और विद्वानों की छवि धूल-धूसरित करने का काम किया है। संविधान और लोकतंत्र की रोशनी में जब दलित और पिछड़े समाज के बुद्धिजीवियों ने इतिहास का पुर्नपाठ किया तो पता चला कि सवर्ण ज्ञानियों और पंडितों ने जिनकी अनदेखी कर के इतिहास से बेदख़ल कर दिया था, वे लोग सामाजिक न्याय के पुरोधा और बहुजन हितैषी थे।

अभी हाल में ही लेखक और संपादक अरुण नारायण ने सदन में दिये गये लालू प्रसाद के भाषणों का एक प्रतिनिधि संकलन निकाला है। इनकी इस प्रकाशित किताब का नाम ‘सदन में लालू प्रसाद: प्रतिनिधि भाषण’ है। यह किताब दिल्ली के ‘द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन’ ने प्रकाशित की है। अरुण नारायण ने इस किताब के भीतर लालू प्रसाद के भाषणों को बड़ी सूझ-बूझ और बौद्धिकता के साथ सात खण्डों में संपादित किया है। इन खंडों में लालू प्रसाद के सामाजिक न्याय, सांप्रदायिकता, घाटे की रेल और मुनाफे की पटरी और सामाजिक मुद्दों की दावेदारी में समय-समय पर सदन के भीतर दिये गये सत्तावन भाषण संकलित हैं।


लालू प्रसाद बिहार की राजनीति के इतिहास में एक स्वतंत्र अध्याय हैं। राजनीति के विश्‍लेषक और ज्ञानी इस राजनेता के राजनीतिक कार्यों और फैसलों के संबंध में कैसी भी राय रखते हों, लेकिन बतौर राजनेता लालू प्रसाद यादव की दलित, पिछड़े, पसमांदा और सर्वसमाज में व्यापक तौर पर स्वीकृति‍ रही है। लालू प्रसाद के दलित, पिछड़े और हाशिये के समाज के पक्ष में ऐसे काम और निर्णय हैं, जिनकी बदौलत सामाजिक न्याय की वकालत और लड़ाई लड़ने वाले नेताओं की पंक्ति में वे शुमार हो जाते हैं। सवर्ण तबका भले ही उन्हें खलनायक के तौर पर देखता हो, लेकिन उन्नति और सामाजिक न्याय के पक्षधर उन्हें दलित और पिछड़ों के भीतर अस्मिता और चेतना का भाव पैदा करने वाले नेता के तौर पर देखते हैं।

लालू प्रसाद अस्सी के दशक से राजनीति में आवाजाही करते हैं। इसके पहले बिहार की राजनीति में सवर्ण समाज के नेताओं का वर्चस्व कायम था। लालू प्रसाद ने अपनी राजनीति से सवर्ण वर्चस्व वाली राजनीति को चुनौती दी। जब सवर्ण वर्चस्व की दीवारों में दरार पड़ने लगी तो राजनीति के पंडितों और विशेषज्ञों ने लालू प्रसाद के शासनकाल को ‘जंगल राज’ की संज्ञा देना शुरू कर दिया था। राजनीतिक विशेषज्ञों ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि लालू प्रसाद के हाथों में सत्ता आने से पहले बिहार के दलितों और पिछड़ों की स्थिति कैसी थी?

इस किताब के भाषणों के आईने में लालू प्रसाद की प्रतिबद्धता और भूमिका ठीक से समझी और परखी जा सकती है। इन भाषणों के भीतर लालू प्रसाद सदन में सामाजिक न्याय और वंचितों के हकों की दावेदारी पेश करते दिखायी देते हैं। इस किताब के पहले खंड के भाषण बताते हैं कि लालू प्रसाद ने अपनी राजनीतिक सत्ता में सांप्रदायिक कारोबार को कभी बिहार की धरती पर फलने-फूलने का मौका नहीं दिया था। धार्मिक उन्माद को औजार बनाकर ‘हिंदू-मुस्लिम’ एकता को खंडित करने वाले राजनेताओं को बिहार की जमीन पर लालू प्रसाद ने उन्माद फैलाने से रोक दिया था। लालू प्रसाद की सूझबूझ ने बिहार की धरती को सांप्रदायिकता के ठप्पे से बचा लिया था।

लालू प्रसाद ने 22 नवंबर 1990 को बिहार विधानसभा के पटल पर साफ तौर पर कहा था कि ‘सांप्रदायिकता के नाम पर हमारी सरकार कोई समझौता नहीं करेगी। हमने संकल्प लिया था भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए।‘’

किताब के दूसरे खंड के भाषण बताते हैं कि कितनी शिद्दत से लालू प्रसाद ने बिहार के साथ हो रहे भेदभाव को सदन में उठाया था। बिहार की गरीबी और बेरोजगारी का सवाल हो या फिर बिहार के लिए विशेष दर्जे की मांग का सवाल हो, वे हमेशा मुखर दिखायी देते हैं। इस खंड के भाषणों में आप देखेंगे कि बिहार के साथ राजनीतिक तौर पर जो सौतेला बर्ताव किया जाता था, उसको लालू प्रसाद ने बड़ी मुखरता के साथ सदन के पटल पर उठाया था।

भारतीय राजनीति में नब्‍बे का दशक काफी उथल-पुथल और बदलाव का सूचक माना जाता है क्योंकि इसी दशक में मंडल कमीशन का मुद्दा व्यापक तौर पर उभर कर सामने आया था। मंडल कमीशन भारतीय राजनीति के इतिहास में एक बड़ा मुद्दा और अध्याय रहा है। इस कमीशन को जहां सवर्णों ने अपने प्रतिनिधित्व पर सबसे बड़ा कुठाराघात माना था, वहीं पिछड़े समुदाय ने इसे प्रतिनिधित्व की रोशनी और अवसर के तौर पर देखा था। लालू प्रसाद के सामाजिक न्याय और भागीदारी के मुद्दे पर सदन में दिये गये भाषणों को किताब के तीसरे खंड में संकलित किया गया है। इस खंड के भाषण बताते हैं कि मंडल कमीशन को लेकर लालू प्रसाद का स्टैन्ड एकदम साफ था। उन्होंने इस कमीशन की खूब वकालत और समर्थन किया था। लालू प्रसाद का कहना था कि ‘आरक्षण कोई भीख नहीं है’। संविधान निर्माताओं ने बहुत सोच समझकर संविधान का दर्पण दिया था और इसी संविधान से दलित और पिछड़ों को प्रतिनिधित्व निकला है। मंडल कमीशन का जन्म भी इसी संविधान से हुआ है।

इस खंड के भाषणों से पता चलता है कि लालू प्रसाद प्रतिनिधित्व और आरक्षण के मुद्दे पर विधानसभा और लोकसभा दोनों सदन में बड़े मुखर रहे हैं। मंड़ल कमीशन विरोधी नेताओं की उन्होंने कड़ी आलोचना की थी। गरीबों और वचिंत तबकों की जमीन पर दावेदारी का सवाल भी लालू प्रसाद ने बड़ी शिद्दत के साथ उठाया था। लालू प्रसाद ने 15 मार्च 1999 में लोकसभा में कहा कि दिल्ली में झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोग बिल्कुल गरीब हैं, शहर को सजाने वाले लोग हैं, लेकिन उन्हें आज तक जमीन पर मालिकना हक नहीं मिला है। लालू प्रसाद ने सरकार से अपील की थी कि ऐसे लोगों को सरकार आवास प्रदान करे। लालू प्रसाद ने सामाजिक न्याय के रास्ते में बाधा बनी उच्च श्रेणी की मानसिकता पर लगातार सवाल उठाया था और उसको एक तरह से खरिज भी कर रहे थे। 15 अप्रैल 1999 को लोकसभा में लालू प्रसाद ने साफ कह दिया था कि ‘हमलोगों के पुरोहित आडवाणी जी कैसे हो सकते हैं? यह हमारे पंडित कैसे हो सकते हैं।’ यह कथन जितना राजनीतिक था, उतना ही वैचारिक भी है। एक तरह से यह कथन पुरोहितवाद को सिरे से खारिज करके रख देता है।

लालू प्रसाद जितना सत्ता में रहकर जनता के सवालों पर मुखर रहते थे, उतना ही विपक्ष की भूमिका में रहकर भी मुखर रहते थे। अरुण नारायण ने किताब के चौथे खंड में ऐसे भाषणों को तरजीह दी है जब लालू प्रसाद विपक्ष की भूमिका थे। इस खंड के भाषणों से पता चलता है कि लालू प्रसाद जनता के सवालों पर सत्ता पक्ष से कितने मारक और तीखे सवाल करते थे। लालू प्रसाद के भाषण इतने मारक होते थे कि कई बार सत्ता पक्ष के लोग तिलमिला जाते थे। पांचवें खंड के भाषणों से गुजरने का बाद पता चलता है कि बिहार में हुए अपराधीकरण और नरसंहार को रोकने की वे बात करते थे। कभी-कभार सत्ता और तंत्र की रस्साकशी में गरीबों के साथ न्याय नहीं हो पता है। छठें और सातवें खंड के अंतर्गत अरुण नारायण ने लालू प्रसाद के रेल और जन लोकपाल पर विचारों वाले भाषण को तरजीह दी है। लालू प्रसाद यादव ने रेल मंत्री रहते हुए रेल सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण किया था। उनके इस दिशा में किये गये कार्यों की सराहना खूब हुई थी।

इस किताब के संपादक अरुण नारायण ने बहुत ही गंभीर और शोधपरक भूमिका लिखी है। इस भूमिका में राजनीति के विभिन्न पड़ाव और महत्वपूर्ण घटनाओं का विश्लेषण एक सुचिंतित दृष्टि के साथ किया गया है। ऐसा नहीं है कि लालू प्रसाद का राजनीतिक जीवन खूबियों से भरा था, अरुण नारायण ने अपनी भूमिका में उनकी कमियों को भी रेखांकित किया है। अरुण नारायण ने लालू प्रसाद के भाषणों को संकलित करके एक तरह से दस्तवेजीकरण का महत्वपूर्ण काम किया है। इस किताब में संकलित भाषण लालू प्रसाद की भूमिका को नये सिरे से समझने और मूल्यांकन करने का आग्रह करते हैं। लालू प्रसाद की राजनीति और प्रतिबद्धता को गहराई से समझने और परखने के लिए विद्वानों और विशेषज्ञों के लिए यह एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

इस किताब के भाषण पढ़ने के बाद जहां लालू प्रसाद के संबंध में कई धारणाएं और भ्रम टूटते और बनते हैं, ये भाषण बताते हैं कि लालू यादव जितने कुशल और संवेदनशील नेता थे, उतने बड़े ही विद्वान भी थे।

किताब– सदन में लालू प्रसाद: प्रतिनिधि भाषण
प्रकाशक– द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन, दिल्ली

श्रृंखला संपादक– संजीव चंदन
संपादक– अरुण नारायण

मूल्य– 450
पृष्‍ठ– 407


लेखक युवा आलोचक और अध्येता हैं

 

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राजनामा