पहाड़ बताते हैं अपनी कहानी



डा. नितीश प्रियदर्शी, भूवैज्ञानिक

छोटानागपुर के नाम से ख्यात झारखंड की भूमि रत्नगर्भा तो है ही, भौगोलिक, धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी बहुत प्राचीन है। भौगोलिक दृष्टि से देखें तो यह अत्यंत प्राचीन काल से कई भूगर्भीय हलचलों की साक्षी रही है।

इन भूगर्भीय हलचलों के कारण ही यहां पहाड़ों, झरनों, नदियों आदि का निर्माण हुआ। यही नहीं यहां राजमहल क्षेत्र में जुरासिक काल के पादप जीवाश्म भी मौजूद हैं। रांची शहर के बीच में रांची पहाड़ी हिमालय से भी करोड़ों साल पुरानी कही जाती है। लगभग 500 से 600 मिलियन वर्ष पुरानी यह पहाड़ी अब अपनी वृद्धावस्था से गुजर रही है। इस पहाड़ी पर बहुत सी चट्टानें अब मिट्टी बन चुकी हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यह पहाड़ी रांची की दूसरी पहाडिय़ों से भी लाखों साल पुरानी है। जिस चट्टान से यह पहाड़ी बनी है उसका भूगर्भीय नाम खोंडालाइट है। इसी तरह की चट्टान से कोणार्क का सूर्य मंदिर बना है, जिसका अब अपरदन हो रहा है। यह ट्रॉपिकल जलवायु में जल्दी अपरदित होती है। रांची पहाड़ी झारखंड के करोड़ों साल के भूगर्भीय बदलाव की अकेला गवाह है। शायद यह विश्व के प्राचीनतम पहाडिय़ों में से एक है।

हिमालय के साथ बने हैं रांची के झरने
रांची के आस पास हमलोग हर वर्ष जल प्रपातों एवं पहाड़ों के आस-पास घूमने जाते हैं लेकिन हम लोगों में से कम ही लोगों को पता है कि इनका निर्माण कैसे और कितने वर्ष पहले हुआ? वैसे तो यहां की चट्टानें काफी प्राचीन हैं। सिंहभूम जिले की चट्टानों की आयु लगभग 3500 मिलियन वर्ष है। रांची के आस-पास की चट्टानों की आयु लगभग 600 से 900 मिलियन वर्ष है। यहां पर पहाड़ों एवं झरनों का निर्माण हिमालय पर्वत के निर्माण के साथ साथ शुरू हुआ। यानी आज से 66 मिलियन वर्ष पहले। उस वक्त यहां काफी उथल पुथल हो रहा था। भूकंप की घटनाएं काफी हो रही थीं। छोटानागपुर की पहाडिय़ांं उठ और टूट रही थीं तथा जल प्रपातों का निर्माण भी हो रहा था। यह वही समय था जब भारत का प्लेट एशिया के प्लेट से टकराए थे। छोटानागपुर के ऊंचे वाले जगहों का बिना रोक टोक बहुत लंबे समय तक अपरदन होता रहा। पहले इस समय पृथ्वी की जलवायु बहुत गर्म थी जो बाद में धीरे-धीरे ठंडी होती गई। उस वक्त पृथ्वी पर छोटे छोटे स्तनधारी जीव रहते थे। डायनोसोर का विनाश हो चुका था। अब आप जब भी इन जल प्रपातों या इनके आस-पास के पहाड़ों पर जाएं तो एक बार ये जरूर सोचें कितने वर्ष पूर्व के हलचल से निर्मित इन्हें देख रहे हैं।

करोड़ों साल पहले आई थी सुनामी
इसी तरीके से देखा जाए तो झारखंड के कुछ जगहों पर गर्म और गंधक युक्त जलधारा के कुंड भी हैं। यहां की चट्टानों पर करोड़ों साल पुराने भूगर्भीय हलचल के साक्ष्य भी हैं। यहां हिमयुग के भी निशान हैं तो समुद्र के के भी निशान है। हाल के शोधों से यह भी ज्ञात हुआ है कि विश्व की सबसे पहले सुनामी करोड़ों साल पहले झारखंड में ही आई थी। अगर हम इन सारे प्रमुख जगहों के बारे में आम लोगों को बताते हुए इन स्थानो का विकास करें तो जिओ टूरिज्म को काफी बढ़ावा मिलेगा और अधिक से अधिक पर्यटक झारखंड आएंगे। विश्व में कई ऐसी जगह हैं, जहां वहां की सरकार भूविज्ञान के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण स्थानों को पर्यटन के रूप में विकसित की है, जहां पूरे विश्व से लोग पहुंचते हैं जैसे नियाग्रा फाल्स, मृत घाटी इत्यादि।

गुफाओं का रहस्य
झारखंड की पहाड़ों में कई गुफाएं हैं, जहां मान्यता है कि आदिम सभ्यताएं बसती थीं। कुछ गुफाओं की चट्टानों पर खासकर हजारीबाग जिले में प्राचीन चित्रकला भी दिखती है। अगर हम इन गुफाओं को चिह्नित कर पर्यटन के लिए खोल दें वहां लोगों को भी फायदा होगा और आमदनी भी होगी। आज भी बहुत सारे लोगों को यह नहीं मालूम की गुफाएं कैसे बनती हैं तथा कितनी पुरानी हैं। यही नहीं यहां बहुत जगहों की चट्टानों की आकृति भी रोचक है कही कछुए के रूप में तो कही सांप के रूप में। यह कैसे बना और कितना पुराना है अगर हम इसकी जानकारी वहां पर लिख कर टांग दें तो उस जगह की महत्ता बढ़ जाएगी। उसी तरह अगर फाल्स की बात करें तो झारखंड के कई फाल्स हिमालय पर्वत बनने के दौरान बने। ये जानकारी बहुत कम लोगों को है। अगर ये जानकारी की ये फाल्स कब और कैसे बने, लिख कर या लेजर शो के माध्यम से बताएं तो भारत के दूसरे जगहों से भी लोग आएंगे।

पादप जीवाश्म
अब अगर झारखंड के राजमहल की बात करें तो वहां पादप जीवाश्म की बहुलता है, जो आज से करोड़ों साल पहले के हैं। माना जाता है कि उस वक्त यहां ज्वालामुखी विस्फोट से जंगल लावा में दब गया और जीवाश्म में परिवर्तित हो गया। इसलिए ये जगह फॉसिल्स पार्क के लिए उपयुक्त हैं। लोग यहां पर आकर इन जीवाश्मों को देख सकेंगे और जान सकेंगे की ये कैसे बना।

क्या होगा फायदा
इससे यहां की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा, लोगों को रोजगार मिलेगा, आमदनी बढ़ेगी और सबसे बड़ी बात ये सारे क्षेत्र जो बर्बाद हो रहे हैं, उनका बचाव होगा।

कहां विकसित हो सकता है जिओ टूरिज्म

-रांची : दशम, हुंडरू, जोन्हा, सीता, हिरनी फाल्स। रांची पहाड़ी, सुतियाम्बे पहाड़ (पिठोरिया) तथा पतरातू घाटी।
-राजमहल: फॉसिल्स वाले क्षेत्र तथा मोती झरना।
-हजारीबाग: कैनेरी हिल्स, पारसनाथ पहाड़ी, दामोदर और भेड़ा नदी का संगम रजरप्पा में। सूरज कुंड , ब्रह्म कुंड, लक्ष्मण कुंड, सीता कुंड। इसमें सूर्य कुंड ज्यादा प्रमुख है।

-सिंहभूम : दलमा पहाड़ी।
-झारखंड के खुले कोयले के खदान जिसमे से कोयला निकलना बंद हो चुका है।

-चाइबासा का रोरो पहाड़ जहां पहले एस्बेस्टस निकाला जाता था।
-नेतरहाट की पहाडिय़ां जो भूविज्ञान के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।

-झारखंड के वे क्षेत्र, जहां चट्टानों के अपरदन के फलस्वरूप विभिन्न आकृति बन गई हैं।

झारखंड की चट्टानों में अरबों साल का इतिहास छुपा हुआ है जिसको आम लोग नहीं जानते। उसी तरह यहां की चट्टानें कैसे बनीं, पहाड़ कैसे बने, फाल्स यानी झरनों का निर्माण कैसे और कब हुआ, झारखंड के प्लांट फॉसिल्स यानि पादप जीवाश्म कितने पुराने हैं? गर्म जल कुंड कैसे बने? इत्यादि बहुत सारी जानकारियां है,ं जिनको आम लोग नहीं जानते। झारखण्ड में अगर इन जगहों का विकास किया जाए तथा लोगों को इन जगहों की जानकारी दी जाए तो बाहर से भी काफी पर्यटक झारखंड आएंगे।

  लोक की खबरें लोकनामा में यहां पढ़िए