1881 में अयोध्या की आबादी थी 11643



पिछले सैकड़ों सालों से बनती-उजड़ती अयोध्या की उदासी को कोई भी पढ़ सकता है। कण-कण में व्यापने वाले राम की यह अयोध्या क्यों इतनी उदास रही, पता नहीं। अलबत्ता राम मंदिर निर्माण की कार्यशाला में उन दिनों पत्थरों की तरासी का काम भी बंद ही था। राम नाम का कीर्तन चल रहा था और उसके उजड़े मुख्य द्वार को भव्य बनाने की तैयारी की जा रही थी। अयोध्या अब बदल रही होगी।

अयोध्या पर न जाने कितनों ने लिखा। अब और लिखेंगे। ह्वेनसांग से लेकर आइने अकबरी तक। उसके बाद भी। पांच सौ सालों में खूब लिखा गया। बार-बार यह भी साबित करने का प्रयास किया गया कि वहां मंदिर तोड़कर मस्जिद तामीर नहीं हुई थी। पुरातत्व विभाग ने इसे झुठला दिया। पांच शताब्दियों से लोगों के मन-मानस में यही बैठा है कि राम मंदिर को तोड़कर बाबर ने मस्जिद बनवाई। अब कुछ यह भी मानते हैं कि उसे मीर बाकी ने बनवाया था तो अब कुछ यह मानने लगे हैं कि यह काम औरंगजेब का है। लोक में बाबर ही बैठा है और इसे तथाकथित रूप से बाबरी मस्जिद ही लोग कहते-लिखते आ रहे हैं। श्रुति की भी एक परंपरा है, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता।

बहरहाल, 1912 में एक किताब आई थी। 'भारत भ्रमणÓ। इसे बाबू साधुचरण प्रसाद ने लिखा था। यह पांच खंडों में प्रकाशित हुई थी और इसके मुंबई के प्रमुख प्रकाशक खेमराज श्रीकृष्णदास ने छापा था। इसके तीसरे खंड में अयोध्या का भी जिक्र है। वह लिखते हैं-'अयोध्या के सामने उत्तर सरयू के बाएं किनारे पर लकड़मंडी का रेलवे स्टेशन है। जिसके निकट वह स्थान है, जहां त्रेतायुग में राजा दशरथ ने अश्वमेघ और पुत्रेष्टि यज्ञ किय था।....अयोध्या में सन्् 1881 में मनुष्य गणना के समय 2545 मकान थे-जिनमें 864 पक्के और 11643 मनुष्य थे। अर्थात 9499 हिंदू, 2141 मुसलमान और तीन दूसरे। 96 देव मंदिर, जिनमें 63 वैष्णव मंदिर और 33 शैव मंदिर, 36 मस्जिदें थीं। लक्ष्मण घाट से थोड़ी दूर 90 फीट ऊंचे टीले पर जैनों के आदिनाथ का मंदिर है।Ó वे आगे लिखते हैं-'कनक भवन, राजा दर्शन सिंह का शिव मंदिर और हनुमान गढ़ी यहां के मंदिरों में उत्तम हैं। अयोध्या में बैरागी वैष्णवों के बहुत से मठ हैं, जिनमें रघुनाथदास जी, मनीराम बाबा व माधोदास के मठ प्रधान हैं। रघुनाथदास नहीं हैं, उनकी गद्दी पर पूजा चढ़ती है। मनीराम बाबा के यहां सदावर्त जारी है और साधुओं की भीड़ रहती है। माधोदास नानकशाही थे, इनके मठ पर नानकशाहियों का सदावर्त है। इनके अतिरिक्त दिगंबरी अखाड़ा, रामप्रसाद जी का अखाड़ा आदि बहुतेरें मठ हैं। अयोध्या के मठों में कई एक धनवान मठ हैं।Ó

अयोध्या के अन्य देव मंदिरों का भी जिक्र करते हैं। इसके साथ यह भी बताते हैं-'अयोध्या में थोड़ी सौदागरी होती है। दुकानों पर यात्रियों के काम की सब वस्तु मिलती है। सवारी के लिए इक्के और ठेलागाड़ी है। यहां इमली के वृक्ष बहुत सुंदर है।...अयोध्या का प्रधान मेला चैत्र रामनवमी का होता है, जिसमें लगभग पांच लाख यात्री आते हैं। यात्रीगण सरयू के स्वर्गद्वार घाट पर स्नान-दान करते हैं। वे बताते हैं कि बाबर ने जन्मस्थान के राम मंदिर को तोड़कर सन् 1528 में उस स्थान पर मसजिद बनवा ली। अकबर के समय हिंदू लोगों ने नागेश्वरनाथ, चंदहरि आदि देवताओं के दश-पांच मंदिर बना लिए थे, जिनको औरगंजेब ने तोड़ डाला था। अवध के नवाब सफदरजंग के समय दीवान नवलराय ने नागेश्वरनाथ मंदिर बनवाया। दिल्ली की बादशाही की घटती के समय अयोध्या में मंदिर बनने लगे। साधुओं के अनेक अखाड़े आ जमें। नवाब वाजिदअली शाह के राज्य के समय अयोध्या में 30 मंदिर बन गए थे। अब छोटे-बड़े सैकड़ों मंदिर बन गए हैं।Ó अब इस अयोध्या में सात हजार मंदिर हैं।
और, अंत में, अयोध्या भगवान राम की जन्मस्थली के साथ पांच जैन तीर्र्थंकरों की भी जन्मस्थली है


पहले तीर्थंकर का जन्म यहीं हुआ था। बुद्ध भी यहां आए और उपदेश किए। इसीलिए ह्वेनसांग भी यहां आया था। तब उसने यहां के बौद्ध मठों का उल्लेख किया था लिखा था कि यहां तीन हजार बौद्ध रहते हैं। अब अयोध्या एक नई पटकथा के लिए तैयार है। अयोध्या की शांति में देश की शांति निहित है।

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